दिल्ली। ट्रायल कोर्ट के न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्य सरकारों से कहा है कि वे ट्रायल कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट उम्र 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष करने के प्रस्ताव पर 2 सितंबर तक अपना निर्णय लें।
राज्यों की दलीलों को कोर्ट ने नहीं माना
सुनवाई के दौरान कुछ राज्य सरकारों ने कहा कि यदि न्यायिक अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाई जाती है तो अन्य सरकारी कर्मचारी भी इसी तरह की मांग कर सकते हैं। उनका यह भी तर्क था कि इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारियों की स्थिति सामान्य सरकारी कर्मचारियों से अलग है।
अनुभवी जजों को सेवा में बनाए रखना ज्यादा लाभदायक
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी के सेवानिवृत्त होने पर सरकार को एकमुश्त सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन का भुगतान करना पड़ता है। इसके साथ ही रिक्त पद पर नियुक्त होने वाले नए जज का वेतन भी देना होता है।पीठ ने माना कि अनुभवी और वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों को कुछ और समय तक सेवा में बनाए रखना प्रशासनिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
सरकारी कर्मचारियों से अलग है न्यायिक अधिकारियों की व्यवस्था
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति संवैधानिक व्यवस्था के तहत होती है। इसलिए उनकी सेवा शर्तों की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती।
राज्यों से पुनर्विचार करने को कहा
अदालत ने सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं से कहा कि वे अपनी-अपनी सरकारों के सामने इस विषय पर दोबारा विचार रखने का आग्रह करें। कोर्ट ने संकेत दिया कि सरकारी कर्मचारियों की मौजूदा सेवानिवृत्ति आयु को आधार बनाकर न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने से इनकार करना उचित नहीं होगा।अब सभी की नजर 2 सितंबर पर रहेगी, जब राज्य सरकारों को इस मुद्दे पर अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्पष्ट करना होगा।



















