बिलासपुर : हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत हर स्थिति में अपने आप लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही या प्रशासनिक देरी के कारण समय पर पदोन्नति का लाभ नहीं मिलता, तो उसे वेतन लाभ से पूरी तरह वंचित करना उचित नहीं होगा।
सेवानिवृत्त अधिकारी की याचिका पर आया फैसला
यह निर्णय सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त जी आर साहू की याचिका पर दिया गया। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें वर्ष 2011 में डिप्टी कमिश्नर पद पर पदोन्नति नहीं दी गई, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को पहले ही प्रमोशन मिल चुका था।मामले में यह तथ्य सामने आया कि विभागीय समीक्षा पदोन्नति समिति ने भी याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए योग्य माना था और उनके नाम की अनुशंसा भी की थी, इसके बावजूद विभाग ने लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की।
विभागीय देरी बनी विवाद की जड़
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा मुख्य रूप से 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक की अवधि के वेतन लाभ से जुड़ा रहा। राज्य सरकार ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता ने पदोन्नत पद पर काम नहीं किया, इसलिए उन्हें “नो वर्क, नो पे” के आधार पर लाभ नहीं दिया जा सकता।वहीं याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने किसी गलती के कारण नहीं, बल्कि विभाग की लापरवाही की वजह से पदोन्नत पद पर कार्य करने का अवसर ही नहीं पाया।
कोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की ओर से कोई चूक नहीं हुई। उन्हें पदोन्नति का अवसर विभागीय निष्क्रियता के कारण नहीं मिल सका, इसलिए ऐसे मामलों में “नो वर्क, नो पे” का सिद्धांत यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
वेतन अंतर के 50 प्रतिशत एरियर्स देने का आदेश
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि संबंधित अधिकारी ने वास्तव में डिप्टी कमिश्नर के पद पर कार्य नहीं किया था, इसलिए पूर्ण वेतन लाभ देना उचित नहीं होगा।न्यायालय ने संतुलित निर्णय देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक के डिप्टी कमिश्नर और सहायक आयुक्त के वेतन अंतर का 50 प्रतिशत एरियर्स चार महीने के भीतर भुगतान किया जाए।इसके साथ ही आदेश में यह भी कहा गया कि यदि समय सीमा में भुगतान नहीं किया गया तो 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।



















