रिटायरमेंट के सालों बाद सरकारी कर्मचारी पर नहीं चलेगी विभागीय कार्रवाई, हाईकोर्ट ने 1.09 लाख की वसूली भी रद्द की

 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था स्पष्ट की है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकल पीठ ने कहा कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के तहत सेवानिवृत्ति के बाद चार साल से अधिक पुराने मामले में विभागीय जांच शुरू नहीं की जा सकती।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार अपनी सामान्य प्रशासनिक शक्तियों के आधार पर पेंशन नियमों में तय अनिवार्य समय-सीमा को मनमाने तरीके से नहीं बढ़ा सकती। इसी आधार पर कोर्ट ने रायपुर सेंट्रल जेल के तत्कालीन अधीक्षक डॉ. श्यामराज सिंह के खिलाफ जारी 1 लाख 9 हजार 975 रुपये की वसूली का आदेश निरस्त कर दिया।

कई साल पुराने मामले में शुरू हुई थी कार्रवाई

डॉ. श्यामराज सिंह वर्ष 2004-05 और 2005-06 के दौरान रायपुर सेंट्रल जेल में अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे। उन पर जेल में बंदियों और उद्योगों से जुड़ी सामग्री की खरीद में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने का आरोप लगाया गया था।आरोप था कि सफेद कागज की खरीद में न्यूनतम निविदा स्वीकार नहीं किए जाने से सरकार को 1,09,975 रुपये का नुकसान हुआ।डॉ. सिंह 31 अगस्त 2010 को सेवानिवृत्त हो गए थे। इसके बाद उन्हें पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ भी प्रदान कर दिए गए। हालांकि, करीब तीन साल बाद 29 मई 2013 को उन्हें आरोप पत्र जारी किया गया और 3 नवंबर 2014 को विभागीय जांच शुरू कर दी गई।

सरकार ने नियम 79 के जरिए दी थी समय-सीमा में छूट

राज्य सरकार ने कार्रवाई को सही ठहराने के लिए छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के नियम 79 का सहारा लिया। सरकार का पक्ष था कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत चार साल की सीमा में छूट दी गई थी।विभागीय जांच पूरी होने के बाद गृह जेल विभाग ने 18 अक्टूबर 2019 को डॉ. सिंह से 1.09 लाख रुपये की वसूली का आदेश जारी किया। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ता ने चार साल की सीमा को बताया अनिवार्य

डॉ. सिंह की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि पेंशन नियमों का संबंधित प्रावधान साफ तौर पर तय करता है कि घटना के चार साल से अधिक समय बीतने के बाद विभागीय कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।उनकी ओर से यह भी कहा गया कि सरकार ने अपनी देरी को सही ठहराने के लिए नियम 79 का इस्तेमाल किया, जबकि इस तरह निर्धारित वैधानिक सीमा को दरकिनार नहीं किया जा सकता।राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि नियम 79 के तहत शासन को आवश्यक परिस्थितियों में समय-सीमा में छूट देने का अधिकार है और इस मामले में वित्त विभाग तथा मंत्रिपरिषद की सहमति से प्रक्रिया अपनाई गई थी।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज किया सरकार का तर्क

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए पेंशन नियमों में इस्तेमाल किए गए ‘Shall’ शब्द को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के अनुसार, इस शब्द के इस्तेमाल से स्पष्ट है कि चार साल की समय-सीमा महज औपचारिक नहीं, बल्कि अनिवार्य प्रावधान है।अदालत ने माना कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों को लंबे समय तक पुराने मामलों की विभागीय कार्रवाई से बचाने के लिए यह कानूनी सुरक्षा दी गई है। यदि सरकार को अपनी प्रशासनिक शक्ति के जरिए इस सीमा को असीमित रूप से बढ़ाने की अनुमति दे दी जाए, तो सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अनिश्चितकाल तक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

7 से 8 साल बाद कार्रवाई को माना नियमों के खिलाफ

हाईकोर्ट ने पाया कि कथित अनियमितता वर्ष 2004 से 2006 के बीच की थी, जबकि विभागीय कार्रवाई वर्ष 2013-14 में शुरू की गई। यानी मामले में कार्रवाई शुरू होने में लगभग 7 से 8 साल की देरी हुई।कोर्ट ने इसे पेंशन नियमों के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारी को मिली वैधानिक सुरक्षा के विपरीत माना। इसी आधार पर डॉ. श्यामराज सिंह के खिलाफ 1,09,975 रुपये की वसूली का आदेश रद्द कर दिया गया।

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