NIT रायपुर के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. आरिफ खान की कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट पहुंची, हाईकोर्ट के फैसले पर लगी अंतरिम रोक

 बिलासपुर। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) रायपुर के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. आरिफ खान से जुड़ा सेवा विस्तार विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा एनआईटी प्रशासन के पक्ष में दिए गए फैसले को चुनौती देते हुए डॉ. खान ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक राहत देते हुए स्थगन आवेदन स्वीकार कर लिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए रखा मामला

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस संजीव सचदेवा की अवकाशकालीन पीठ ने याचिका पर विचार करते हुए मामले को नियमित कार्यदिवसों में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। ग्रीष्मकालीन अवकाश और सीमित कार्य अवधि समाप्त होने के बाद इस प्रकरण पर विस्तृत सुनवाई होगी।

क्या था हाईकोर्ट का फैसला?

इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने एनआईटी रायपुर और शिक्षा मंत्रालय की अपील स्वीकार करते हुए सिंगल बेंच के आदेश को निरस्त कर दिया था।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि यदि किसी अधिकारी की नियुक्ति निश्चित अवधि या संविदा के आधार पर हुई है, तो कार्यकाल समाप्त होने के बाद सेवा विस्तार नहीं देना किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं माना जाएगा। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत अलग से सुनवाई का अवसर देना आवश्यक नहीं है, जब तक आदेश में कोई आरोप या कलंक न लगाया गया हो।

सिंगल बेंच ने क्यों दिया था डॉ. खान के पक्ष में फैसला?

हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने दिसंबर 2025 में माना था कि डॉ. आरिफ खान को बिना पर्याप्त अवसर दिए कार्यमुक्त करना प्रक्रियात्मक दृष्टि से उचित नहीं था। इसी आधार पर एनआईटी का आदेश रद्द किया गया था। हालांकि उस समय तक डॉ. खान कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय में वित्त अधिकारी के रूप में पदभार ग्रहण कर चुके थे, इसलिए अदालत ने पुनर्बहाली का आदेश नहीं दिया था।

पूरा मामला क्या है?

डॉ. आरिफ खान को 22 फरवरी 2021 को NIT रायपुर में रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया था। एक वर्ष बाद बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने उनके कार्य को संतोषजनक माना था। लेकिन बाद में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा उनकी पात्रता को लेकर उठाए गए सवालों और प्रशासनिक समीक्षा के बाद बोर्ड ने फरवरी 2023 में उनका कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाने का फैसला लिया।

इसके बाद 23 फरवरी 2023 को उन्हें कार्यमुक्त करने का आदेश जारी किया गया था, जिसे उन्होंने अदालत में चुनौती दी।

डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच का फैसला क्यों पलटा?

डिवीजन बेंच ने अपने निर्णय में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख किया—

  • डॉ. खान ने केवल कार्यमुक्ति आदेश को चुनौती दी थी, जबकि इसके आधार बने बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के मूल निर्णय को चुनौती नहीं दी।
  • प्रशासनिक कानून के अनुसार मूल निर्णय को चुनौती दिए बिना उससे जुड़े आदेश को निरस्त नहीं किया जा सकता।
  • जनवरी 2026 में डॉ. खान ने जम्मू-कश्मीर में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जिससे सेवा निरंतरता या पुनर्बहाली का मुद्दा कमजोर हो गया।
  • अदालत ने माना कि एनआईटी का बोर्ड ऑफ गवर्नर्स संस्थान की सर्वोच्च वैधानिक संस्था है और सेवा विस्तार न देना प्रशासनिक निर्णय के दायरे में आता है।

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थगन आवेदन स्वीकार किए जाने के बाद मामला फिलहाल खुला हुआ है। अब शीर्ष अदालत यह तय करेगी कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का फैसला कायम रहेगा या डॉ. आरिफ खान की याचिका में उठाए गए कानूनी तर्कों पर नए सिरे से विचार किया जाएगा। शिक्षा और प्रशासनिक सेवा से जुड़े इस मामले पर अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हुई है।

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