दुनिया तक पहुंची सोनाबाई की लोककला, लेकिन गांव में बंद पड़ा संग्रहालय, अब विरासत बचाने की बड़ी चुनौती

 सरगुजा : प्रसिद्ध भित्तिचित्र कलाकार सोनाबाई ने अपनी अनोखी कला से देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहचान बनाई। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन मिट्टी, दीवारों और प्राकृतिक रंगों से रची गई उनकी कलाकृतियां उनकी अद्भुत कल्पनाशक्ति और सरगुजा की लोकसंस्कृति की कहानी आज भी कहती हैं। विडंबना यह है कि जिस कला को दुनिया ने सराहा, वही विरासत अब अपने गांव में संरक्षण और देखरेख की बाट जोह रही है।सोनाबाई की स्मृति और उनकी कलाकृतियों को सुरक्षित रखने के लिए सरगुजा के पुहपुटरा गांव में करीब 15 लाख रुपये की लागत से संग्रहालय बनाया गया था। लेकिन वर्षों बाद भी इसका नियमित संचालन शुरू नहीं हो सका और संग्रहालय बंद पड़ा है।

पुहपुटरा गांव की दीवारों में आज भी जीवित है सोनाबाई की कला

लखनपुर क्षेत्र का पुहपुटरा गांव सोनाबाई की कर्मभूमि रहा है। वर्ष 2008 में उनके निधन के बाद भी उनके घर और आसपास की दीवारों पर बनी कलाकृतियां उनकी रचनात्मक दुनिया की झलक देती हैं।मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से तैयार इन भित्तिचित्रों में सरगुजा की लोकजीवन, परंपराएं और सांस्कृतिक पहचान दिखाई देती है। हालांकि नियमित संरक्षण नहीं मिलने से इस अनमोल धरोहर के धीरे-धीरे नष्ट होने की आशंका बढ़ रही है।

अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंची थी पहचान

सोनाबाई की कला सरगुजा या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही। उनकी भित्तिचित्र शैली ने विदेशों में भी पहचान बनाई और अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया तक उनकी कला पहुंची। उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन करने के साथ प्रशिक्षण भी दिया।राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें कई सम्मान मिले। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सहित कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने उनकी कला को सम्मानित किया। ऐसे में आज उनकी कला और स्मृतियों का अपने ही गांव में उपेक्षित रहना कई सवाल खड़े करता है।

15 लाख का संग्रहालय बना, लेकिन दरवाजे पर लटका रहा ताला

सोनाबाई की उपलब्धियों और कलाकृतियों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से पुहपुटरा में संग्रहालय तैयार किया गया था। योजना थी कि यहां आने वाले लोग उनकी कला को करीब से देखें, समझें और सरगुजा की इस विशिष्ट लोकशैली से परिचित हो सकें।लेकिन लंबे समय से संग्रहालय बंद है। जिस स्थान को लोककला के संरक्षण और पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बनाया जा सकता था, वह अब वीरान नजर आता है।

परिवार की मांग, बच्चों और युवाओं को मिले कला का प्रशिक्षण

सोनाबाई का परिवार केवल संग्रहालय का ताला खुलवाने की मांग नहीं कर रहा है। परिवार चाहता है कि गांव के बच्चों और युवाओं को सोनाबाई की भित्तिचित्र कला का प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि यह कला केवल पुरानी दीवारों तक सीमित न रह जाए।परिवार का कहना है कि सोनाबाई की कलाकृतियों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए, उनकी कला पर शोध हो और पुहपुटरा गांव को लोककला के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। उनके बेटे दरोगा राजवाड़े का मानना है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इस विरासत को बचाना मुश्किल हो सकता है।

सरकार ने संरक्षण और संग्रहालय शुरू करने का दिया भरोसा

मामला सरकार तक पहुंचने के बाद संस्कृति, पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री राजेश अग्रवाल ने सोनाबाई की कला के संरक्षण और इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए काम करने की बात कही है। उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए कार्ययोजना तैयार करने का भरोसा भी दिया है।साथ ही सोनाबाई की स्मृति में बने संग्रहालय को शुरू करने की दिशा में पहल करने का आश्वासन दिया गया है।

अब इंतजार सिर्फ आश्वासन को हकीकत में बदलने का

सोनाबाई की कला केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि सरगुजा की सांस्कृतिक पहचान और लोक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनकी कलाकृतियों में दर्ज जीवन, प्रकृति और लोकसंस्कृति की झलक आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मूल्यवान धरोहर हो सकती है।अब बड़ा सवाल यह है कि वर्षों से बंद पड़ा संग्रहालय कब खुलेगा और सोनाबाई की कला को बचाने के लिए जमीनी स्तर पर कब ठोस काम शुरू होगा। दुनिया तक अपनी पहचान पहुंचाने वाली इस लोककला को अपने ही घर में नई जिंदगी मिलती है या नहीं, इस पर अब सबकी नजर रहेगी।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *