बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुर्ग के चिकित्सक डॉ. दुष्यंत खोसला को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ जारी जिला बदर आदेश और गृह विभाग द्वारा अपील खारिज करने के फैसले को निरस्त कर दिया है। अदालत ने माना कि पूरी कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई, इसलिए यह आदेश टिक नहीं सकता।जस्टिस रविन्द्र अग्रवाल और जस्टिस नरेश चंद्रवंशी की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
याचिका में उठाए गए थे गंभीर सवाल
डॉ. खोसला की ओर से अधिवक्ताओं श्रद्धा राज ज्योतिषी, प्रमांशु शर्मा और संदीप कुमार तिवारी ने अदालत में पक्ष रखा। याचिका में कहा गया कि जिला प्रशासन ने प्रभावी सुनवाई का अवसर दिए बिना ही गवाहों के बयान दर्ज कर लिए। इतना ही नहीं, गवाहों से जिरह करने और अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर भी उपलब्ध नहीं कराया गया।याचिका में यह भी कहा गया कि जिला बदर का आदेश केवल लंबित आपराधिक मामलों के आधार पर जारी कर दिया गया, जबकि इसके लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद नहीं थे।
हाईकोर्ट ने प्रक्रिया पर उठाए सवाल
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि जिला बदर जैसी कार्रवाई किसी व्यक्ति के निवास, आवागमन और आजीविका जैसे मौलिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करती है। इसलिए ऐसे मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और वैधानिक प्रक्रिया का पूरी सख्ती से पालन किया जाना अनिवार्य है।अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होना या उनका लंबित होना जिला बदर का आधार नहीं बन सकता। प्रशासन को यह भी साबित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति की गतिविधियों से वास्तव में लोक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
रिकॉर्ड में नहीं मिले पर्याप्त साक्ष्य
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि प्रशासन ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि डॉ. दुष्यंत खोसला की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा थीं।इसी आधार पर अदालत ने 8 जनवरी 2026 को जारी जिला बदर आदेश और 7 मई 2026 को गृह विभाग द्वारा पारित अपीलीय आदेश दोनों को रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।



















