वन भूमि और पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का मामला पहुंचा हाई कोर्ट, सरकार और निजी कंपनी से मांगा जवाब

 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र में वन भूमि के कथित अतिक्रमण और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामले में दायर जनहित याचिका पर बिलासपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और संबंधित निजी कंपनी को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ में हुई।

पहली याचिका तकनीकी कारण से हुई थी निरस्त

याचिकाकर्ता ने इससे पहले भी इसी मुद्दे पर जनहित याचिका दाखिल की थी, लेकिन सुरक्षा राशि जमा करने से छूट की मांग अदालत ने स्वीकार नहीं की। निर्धारित राशि जमा नहीं होने के कारण 7 मई 2026 को वह याचिका खारिज कर दी गई थी। हालांकि अदालत ने नियमों के तहत नई याचिका दायर करने की अनुमति दी थी। इसके बाद सभी औपचारिकताएं पूरी कर दोबारा जनहित याचिका दाखिल की गई।

सरकार और कंपनी को जारी हुआ नोटिस

19 मई 2026 को हुई प्रारंभिक सुनवाई में हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार, केंद्र सरकार और संबंधित निजी कंपनी को नोटिस जारी किया। राज्य और केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ताओं ने नोटिस स्वीकार कर लिया, जबकि निजी कंपनी को नियमानुसार नोटिस भेजने के निर्देश दिए गए।

राज्य सरकार को जवाब के लिए मिला अतिरिक्त समय

18 जून 2026 को हुई अगली सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया। अदालत ने एक सप्ताह की मोहलत देते हुए जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। साथ ही याचिकाकर्ता को जवाब मिलने के बाद एक सप्ताह के भीतर प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति भी प्रदान की।सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि निजी कंपनी अपना जवाब पहले ही अदालत में दाखिल कर चुकी है। इस पर भी याचिकाकर्ता को जवाब प्रस्तुत करने की छूट दी गई। अब मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई 2026 को होगी।

क्या हैं जनहित याचिका के मुख्य आरोप

याचिकाकर्ता विवेक कुमार पांडेय का आरोप है कि धरमजयगढ़ विकासखंड के ग्राम भालूपखना स्थित 7.50 मेगावाट लघु जल विद्युत परियोजना के लिए आवश्यक वन स्वीकृतियां लिए बिना वन और राजस्व भूमि पर गैर-वानिकी गतिविधियां संचालित की गईं। साथ ही 33 केवी ट्रांसमिशन लाइन के विस्तार में भी पर्यावरणीय और कानूनी नियमों की अनदेखी की गई।

11 केवी लाइन के पोल पर 33 केवी लाइन बिछाने का आरोप

याचिका में दावा किया गया है कि भालूपखना से चरखापारा तक 11 केवी विद्युत लाइन के नवीनीकरण के दौरान लगाए गए सीएसपीडीसीएल के नए पोलों का उपयोग निजी परियोजना की 33 केवी ट्रांसमिशन लाइन के लिए भी किया गया। आरोप है कि ऐसा कर अलग से वन भूमि डायवर्सन और जरूरी वैधानिक स्वीकृतियों की प्रक्रिया से बचने की कोशिश की गई।

याचिका के अनुसार परियोजना प्रबंधन ने पहले आवश्यक अनुमति के लिए आवेदन जरूर किया था, लेकिन मंजूरी मिलने से पहले ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया।

विद्युत विभाग और ठेकेदार पर मिलीभगत के आरोप

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि विद्युत विभाग के कुछ अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत से 11 केवी लाइन के नवीनीकरण के नाम पर ऐसा ढांचा तैयार किया गया, जिसका सीधा लाभ निजी जल विद्युत परियोजना को मिला। इससे सरकारी संसाधनों के उपयोग और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हुए हैं।

एक ही ठेकेदार को मिले दोनों काम

याचिका में यह भी कहा गया है कि 11 केवी लाइन के नवीनीकरण और निजी परियोजना की 33 केवी ट्रांसमिशन लाइन, दोनों का ठेका एक ही ठेकेदार कुलदीप सिंह के पास था। आरोप है कि अलग-अलग संरचना विकसित करने के बजाय एक ही विद्युत ढांचे का इस्तेमाल किया गया, जिससे सरकारी और निजी परियोजनाओं के बीच की सीमा धुंधली हो गई।

हाथी प्रभावित क्षेत्र में परियोजना पर भी उठे सवाल

जनहित याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि धरमजयगढ़ वनमंडल प्रदेश के सबसे संवेदनशील हाथी प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है, जहां हाथियों का नियमित आवागमन होता है। ऐसे क्षेत्र में 33 केवी ट्रांसमिशन लाइन के विस्तार को लेकर वन्यजीवों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि हाथी वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत सर्वोच्च श्रेणी के संरक्षित जीव हैं, इसलिए किसी भी परियोजना में पर्यावरणीय और वन संबंधी नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना आवश्यक है।

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