बिलासपुर : में छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित मामले में लंबा इंतजार आखिरकार खत्म हुआ। साल 2000 में शराब तस्करों द्वारा पुलिस पर किए गए हमले के मामले में हाईकोर्ट ने अहम निर्णय सुनाया है। अदालत ने आरोपियों को दोषी मानते हुए उनके अपराध को बरकरार रखा, हालांकि सजा में कमी जरूर दी गई।
क्या था पूरा मामला
13 अगस्त 2000 को जीआरपी चौकी चरौदा, दुर्ग को सूचना मिली थी कि रेलवे स्टेशन के डिपार्चर यार्ड के पास अवैध शराब की बिक्री हो रही है। सूचना मिलते ही आरक्षक योगेंद्र सिंह और परमानंद भोई मौके पर पहुंचे।
पुलिस को देखते ही मौके पर मौजूद लोग पहले भाग गए, लेकिन कुछ समय बाद अपने साथियों के साथ लौटकर उन्होंने पुलिस पर हमला बोल दिया।
चाकू, डंडे और लाठियों से किया हमला
हमलावरों ने दोनों पुलिसकर्मियों को निशाना बनाते हुए चाकू, लाठी और डंडों से बेरहमी से हमला किया।
योगेंद्र सिंह को पेट, पसलियों और सिर पर गंभीर चोटें आईं
परमानंद भोई के पेट में चाकू से वार किया गया
अन्य आरोपियों ने भी मारपीट में हिस्सा लिया
घटना के बाद आरोपी शराब के कार्टून लेकर फरार हो गए। घायल जवानों को पहले दुर्ग अस्पताल और बाद में भिलाई सेक्टर-9 अस्पताल में भर्ती कराया गया।
ट्रायल कोर्ट का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपियों को कई धाराओं में दोषी ठहराया था। इनमें हत्या के प्रयास, डकैती और मारपीट से जुड़ी धाराएं शामिल थीं।
अदालत ने उन्हें अधिकतम 7 साल तक की सजा और जुर्माना सुनाया था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि आरोपियों ने संगठित होकर पुलिस पर हमला किया और जब्त शराब को छुड़ाने की कोशिश की। यह स्पष्ट रूप से गैरकानूनी जमावड़ा और डकैती का मामला बनता है।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि घटना को 26 साल बीत चुके हैं और आरोपी अब उम्र के उस दौर में पहुंच चुके हैं, जहां सजा में कुछ नरमी दी जा सकती है।
सजा में बदलाव
हाईकोर्ट ने सजा को कम करते हुए अहम संशोधन किए:
7 साल की सजा घटाकर 4 साल की गई
खतरनाक हथियार से डकैती की धारा से राहत दी गई
अन्य धाराओं में दोष बरकरार रखा गया
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि 5 या उससे अधिक लोग मिलकर अपराध करते हैं, तो भले ही कुछ आरोपी फरार हों, फिर भी इसे डकैती का मामला माना जाएगा।
क्या है इस फैसले का महत्व
यह फैसला बताता है कि गंभीर अपराधों में समय बीत जाने के बावजूद न्याय प्रक्रिया अपना काम करती है। साथ ही अदालत परिस्थितियों और समय के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए संतुलित निर्णय भी देती है।



















