Bilaspur हाईकोर्ट ने जमीन से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई व्यक्ति ऐसी संपत्ति खरीदता है, जिस पर पहले से न्यायालय में विवाद लंबित है, तो उसे अलग से पक्षकार बनाकर सुनना जरूरी नहीं है। अदालत ने साफ किया कि ऐसा खरीदार अपने विक्रेता के अधिकारों का ही उत्तराधिकारी माना जाएगा।
मामला क्या था
रायपुर की जमीन को लेकर पुराना विवाद सामने आया
Raipur के ग्राम टेमरी में स्थित लगभग 0.376 हेक्टेयर जमीन को दीप्ति अग्रवाल ने नवंबर 2025 में बहुरलाल साहू और यतिराम साहू से करीब 1.20 करोड़ रुपये में खरीदा था।
लेकिन इस जमीन को लेकर पहले से ही संजय कुमार नचरानी और साहू परिवार के बीच राजस्व न्यायालय में विवाद जारी था।
पुराने रिकॉर्ड को लेकर उठा विवाद
संजय नचरानी का कहना था कि उन्होंने यह जमीन वर्ष 1997 में खरीदी थी और उनका नाम रिकॉर्ड में दर्ज था। तकनीकी गड़बड़ी के कारण ऑनलाइन पोर्टल में पुराने नाम की प्रविष्टि दिखने लगी, जिससे विवाद गहराया।
खरीदार की दलील और विरोध पक्ष का जवाब
खुद को बताया वैध खरीदार
दीप्ति अग्रवाल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह मांग की कि उन्हें भी मामले में पक्षकार बनाकर सुना जाए। उनका तर्क था कि वे नेक नीयत से जमीन खरीदने वाली खरीदार हैं और बिना उनकी सुनवाई के आदेश जारी करना उनके अधिकारों के खिलाफ है।
विरोध में दी गई मजबूत दलील
वहीं, संजय नचरानी की ओर से कहा गया कि जमीन खरीद के समय मामला पहले से कोर्ट में लंबित था। ऐसी स्थिति में खरीदार को अलग से सुनवाई का अधिकार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि वह विक्रेता के अधिकारों पर ही निर्भर होता है।
अदालत का फैसला
याचिका खारिज, खरीदार को ठहराया जिम्मेदार
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की एकल पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इतनी बड़ी रकम निवेश करने से पहले जमीन के रिकॉर्ड और उससे जुड़े विवादों की गहन जांच करना खरीदार की जिम्मेदारी है।
कानून क्या कहता है
धारा 55 के तहत खरीदार की जिम्मेदारी तय
अदालत ने अपने फैसले में ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 55 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी संपत्ति को खरीदने से पहले उससे जुड़े सभी कानूनी पहलुओं और लंबित मामलों की जानकारी लेना खरीदार का कर्तव्य है।
फैसले के मायने
- विवादित संपत्ति खरीदने वालों के लिए चेतावनी
- बिना जांच के निवेश करने पर कानूनी जोखिम
- खरीदार पूरी तरह विक्रेता के अधिकारों पर निर्भर



















