रिश्वत कांड पर हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, बार बार याचिका को बताया न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग

बिलासपुर में रिश्वत लेते सीबीआई के हाथों पकड़े गए रेलवे अधिकारी से जुड़े मामले पर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ कहा कि जब किसी मुद्दे पर निर्णय पहले ही स्पष्ट हो चुका हो तो उसी विषय को दोबारा उठाना उचित नहीं है।

अदालत ने संबंधित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि एक ही विवाद पर बार बार याचिका दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है।

विभागीय जांच और चयन को लेकर चली लंबी कानूनी लड़ाई

यह मामला दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के सहायक मंडल विद्युत अभियंता पीयूष मिश्रा से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2015 के अगस्त माह में सीबीआई ने रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार किया था।

इसके बाद रेलवे विभाग ने वर्ष 2016 के अगस्त माह में उनके खिलाफ गंभीर दंडात्मक चार्जशीट जारी की। आरोपी अधिकारी ने जांच प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए विभागीय स्तर पर कई प्रयास किए और अपनी पसंद के सेवानिवृत्त अधिकारी को डिफेंस असिस्टेंट बनाने की मांग रखी, जिसे रेलवे ने अस्वीकार कर दिया।

बार बार असफल हुई याचिकाएं, फिर भी जारी रहा प्रयास

रेलवे अधिकारी ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का रुख किया। वर्ष 2019 में अधिकरण ने उनकी मांग को खारिज कर दिया।

इसके बाद भी अलग अलग स्तर पर कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन हर बार असफलता मिली। अंततः वर्ष 2025 के नवंबर माह में अधिकरण ने एक बार फिर उनकी याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अंतिम सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने भी राहत देने से इनकार कर दिया।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया

जस्टिस संजय एस अग्रवाल और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि विभागीय जांच को लंबा खींचने और बार बार समान मुद्दे उठाने की प्रवृत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती।

अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारी अपनी पसंद के व्यक्ति को जांच सहायता के लिए बाध्य नहीं कर सकता। यह अधिकार नहीं बल्कि नियम आधारित सुविधा है।

रेज ज्यूडिकाटा सिद्धांत का हवाला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में रेज ज्यूडिकाटा सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी विवाद पर न्यायालय या अधिकरण निर्णय दे चुका हो तो उसी विषय पर दोबारा सुनवाई नहीं हो सकती।

इस सिद्धांत का उद्देश्य यही है कि
न्यायिक प्रक्रिया अनंत न चले और एक ही विवाद को बार बार अदालत तक न लाया जाए।

दस वर्ष पुराना मामला, जांच अब भी अधूरी

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि वर्ष 2016 से चल रहे इस प्रकरण में दस वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी जांच पूरी नहीं हो पाई। इसका मुख्य कारण लगातार दायर की जा रही कानूनी अड़चनें बताई गईं।

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